सीहोर | 20 अगस्त 2026
वीआईटी भोपाल यूनिवर्सिटी ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और विरासत अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए अपने यहां शिक्षा केंद्र की स्थापना चांसलर डॉ. जी. विश्वनाथन के दूरदर्शी नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में की गई है। इस पहल को वाइस प्रेसिडेंट डॉ. शंकर विश्वनाथन, असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट सुश्री कादंबरी एस. विश्वनाथन तथा ट्रस्टी श्रीमती रमणी बालासुंदरम के निरंतर प्रोत्साहन एवं सहयोग से साकार रूप मिला है ।
शिक्षा केंद्र का आशय

दरअसल शिक्षा से आशय सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम , हेरिटेज एंड अलाइड स्टडी (सीआईकेएसएचए) है | दरअसल यह एक बहुविषयी केंद्र है, जो शिक्षा, अनुसंधान, दस्तावेजीकरण और तकनीकी नवाचार के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणालियों को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है।
क्या कहा अतिथियों ने

इस मौके पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए वाइस प्रेसिडेंट डॉ शंकर विश्वनाथन, ने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति एवं आधुनिक विज्ञान और तकनीक दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृति और तकनीक का समन्वय ही भविष्य के लिए बेहतर समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
वाइस चांसलर डॉ. सतीश कुमार मोढ़ ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान और परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह ज्ञान परंपरा शिक्षा, शोध और नवाचार के लिए सदैव मार्गदर्शक रही है। प्रो-वाइस चांसलर डॉ. टी. बी. श्रीधरन ने भारतीय पूर्वजों द्वारा विकसित वास्तुकला, पारंपरिक चिकित्सा एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित किया तथा बताया कि ये ज्ञान आज भी आधुनिक शिक्षा और शोध के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। बिजनेस स्कूल के डीन प्रभारी और सेवानिवृत्त आई. ए. एस. अधिकारी डॉ. दशरथी सतपथी ने भारतीय मंदिर वास्तुकला पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मंदिरों का निर्माण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। उन्होंने रेत, पत्थर और जल आधारित निर्माण तकनीकों के माध्यम से भारतीय स्थापत्य में निहित वैज्ञानिक सोच और इंजीनियरिंग ज्ञान को समझाया।
स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर की डीन ने समझाया महत्त्व
समारोह के दौरान वीआईटी भोपाल यूनिवर्सिटी की स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर की डीन एवं शिक्षा केंद्र की संयोजक डॉ. शीतल शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल योग, मंदिर या विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों से विकसित एक जीवंत ज्ञान परंपरा है, जिसमें गणित, खगोल विज्ञान, वास्तुकला, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, भाषा विज्ञान, पर्यावरण, कला एवं सतत विकास जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं। उन्होंने बताया कि शिक्षा का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपराओं को आधुनिक तकनीकों जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑगमेंटेड एवं वर्चुअल रियलिटी , डिजिटल ट्विन, बीआईएम एवं रिमोट सेंसिंग के साथ जोड़कर शोध, नवाचार एवं विरासत संरक्षण के नए अवसर विकसित करना है।
एसपीए भोपाल के संस्थापक निदेशक ने दिया व्याख्यान
समारोह के अंतिम सत्र में भोपाल से आये स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के संस्थापक निदेशक प्रो. डॉ. अजय खरे ने अपना व्याख्यान “भूमि के नटराज की मंदिर नगरी को आकार देने में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की भूमिका: नाट्यशास्त्र एवं शोभायात्रा मार्ग”पर दिया | उन्होंने ने बताया कि त्योहार, अनुष्ठान, नृत्य, संगीत, पारंपरिक कलाएं और मंदिर शोभायात्राएं भारत के मंदिर नगरों की योजना एवं विकास को सदियों से प्रभावित करती रही हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल स्मारकों और भवनों का संरक्षण ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण भी आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है। उन्होंने बताया कि समूचे भारत वर्ष में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारतीय ज्ञान प्रणाली पहल एवं विकसित भारत मिशन 2047 के अनुरूप, शिक्षा शोध, विरासत दस्तावेजीकरण, विशेषज्ञ व्याख्यान, कार्यशालाओं, सम्मेलनों एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपराओं को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक से जोड़ने का कार्य बेहतर तरीके से किया जाएगा । समारोह के अंत में आभार शिक्षा की सह-संयोजक डॉ. सौम्य शंकर घोष द्वारा व्यक्त किया गया | समारोह में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, शोधकर्ता एवं विद्यार्थी काफी संख्या में उपस्थित रहे।

