सलधा/बेमेतरा- जिला के ग्राम सलधा जहां सवा लाख शिवलिंग का ऐतिहासिक मंदिर बन रहा है वहीं उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज का दिव्य भव्य चातुर्मास चल रहा है। सर्व प्रथम समस्त ग्रामवासी मजगांव के द्वारा पादुका पूजन किया गया। दण्डी स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी महाराज ने सलधा शिवलिंग स्थापित करने वाले भक्तों के नाम की घोषणा की। अप्रमेय स्वामी जी ने विरुदावली का वाचन किया।
शंकराचार्य जी ने कहा कि एक दिन माता पार्वती स्नान के लिए गईं नंदी को द्वार पे रखा और भगवान शिव जी आ गए तब माता ने कहा कि नन्दी मैंने मना किया था तो क्यों अंदर आने दिया तब नन्दी ने कहा मैंने तो शिव जी को आने दिया तब माता पार्वती ने सोंचा कि यदि हमारा गण होता तो हमारी बात मानता एक दिन माता पार्वती जी ने भगवान श्री शिव जी की आंखें बंद की तब शिव जी ने कहा कि तुमने पशु जैसा काम किया है इसलिए पशु हो जाओ और माता पार्वती गाय बन गई। गौ के रुप में थीं तो गोबर था उसी से एक पुरुष का निर्माण कर दिया और कहा कि आज से आप मेरे गण हो गये उसमें प्राण डाल दिया और कहा कि आप हमारे पुत्र हैं बालक ने प्रणाम किया और कहा कि बताइये मैं आपका कौन सा कार्य करुं आज्ञाकारी पुत्र मिला माता प्रसन्न हो गई और कहा कि द्वारपाल हो जाओ। सभी पुत्र पुत्रियों का कर्तव्य है कि अपने माता-पिता के आदेश का पालन करें। माता ने हाथ में लाठी दी और कहा मैं स्नान में जा रही हूं और कहा कि कोई अंदर न आए शंकर जी आये गणेश जी ने रोक दिया और शिव गणों से लड़ाई होने लगी ब्रह्मा विष्णु शिव सभी आ गये गणेश जी का सिर काट दिया गया माता पार्वती ने शक्तियों को उत्पन्न किया जो प्रलय मचाने लगीं तब हाथी का सिर जोड़ कर जीवित किया गया और सभी गणों का अध्यक्ष बनाया गया प्रथम पूज्य बनाया गया।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में यह निरंतर अनुभव होता है कि ‘मैं बच्चा था, मैं जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा होऊँगा
बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक शरीर की अवस्थाएँ निरंतर बदलती रहती हैं, किंतु इन समस्त परिवर्तनों का अनुभव करने वाला ‘मैं’ सदैव एक समान रहता है। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि परिवर्तनशील शरीर अलग है और उसका अनुभव करने वाली आत्मा अलग है।
उक्त उद्गार परमाराध्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती महाराज ने सलधा में आयोजित ऐतिहासिक चातुर्मास्य के पावन अवसर पर प्रस्थानत्रयी पाठ के दौरान व्यक्त किए।
अथर्ववेद की शौनक शाखा से उद्धृत माण्डूक्य उपनिषद का संदर्भ देते हुए शंकराचार्य महाराज ने आत्मा के चार पादों और उसकी विभिन्न अवस्थाओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया। जाग्रत अवस्था में चेतन तत्त्व ‘विश्व’ रूप में बाह्य जगत् का अनुभव करता है। स्वप्न की अवस्था में वही चेतन ‘तैजस’ के रूप में मानसिक जगत् की अनुभूति करता है। गाढ़ निद्रा अर्थात् सुषुप्ति की अवस्था में वह ‘प्राज्ञ’ रूप में विश्राम करता है। ‘तुरीय’, जहाँ समस्त द्वैत समाप्त होकर केवल शुद्ध अद्वैत अर्थात् परम आत्मा का साक्षात्कार होता है। आत्मा ही इन सभी अवस्थाओं का निर्लिप्त साक्षी है।
महाराजश्री ने इस गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को ओंकार (ॐ) की महिमा से जोड़ते हुए समझाया कि ओंकार की अ-कार, उ-कार और म-कार की मात्राएँ तथा अनुस्वार (बिंदु/नाद) क्रमबद्ध रूप से जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्था के ही प्रतीक हैं। ओंकार साधना से जीव अपनी वास्तविक अद्वैत स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर सकता है।
अयोध्या के कार सेवक संतोष दुबे पहुंचे सपाद लक्षेश्वर धाम
बीते दिन गुरुवार को अयोध्या के कार सेवक संतोष दुबे सपाद लक्षेश्वर धाम पहुँच शंकराचार्य जी के दर्शन प्राप्त कर आशीर्वाद लिया उन्होंने कहा अयोध्या के राम मंदिर में चोरी बहुत बड़ा अपराध है। मैं इसके विरुद्ध लड़ता रहुंगा।
वही कोलकाता से आए निरंजन दास शंकर मठ, मोहन साधुखा हुगली, दंडी स्वामी उमेश आश्रम जी महाराज, सुरेंद्र आश्रम जी महाराज, वासुदेवाश्रम जी महाराज, छोटे आश्रम जी महाराज, शिवाश्रम जी महाराज, रामाश्रम जी महाराज, श्रीमज्ज्योतिर्मायनंद: सरस्वती जी महाराज, स्वामी श्री अप्रयय शिवसदातकृतानंद गिरी जी महाराज, ब्रह्मचारी शारदानंद, शंकर स्वरूप, प्रभु प्रभुतानंद, शंभु प्रेमानंद, ईश्वरानन्द, वैष्णवानंद, साधु सर्व शरण, आदि अनंतानन्द, बाबा धार्त धार्यानंद, मुक्तानंद, साध्वी पूर्णांबा, साध्वी शारदाम्बा, आनंद उपधाध्य, रत्ना देवी उपाध्याय, रवि शास्त्री, प्रवीण गर्ग, अनुराग शर्मा, सनोज, संतोष मंडल, गौतम जैन, बलराम साहू, अश्वनी साहू, वेद पाठी विद्यार्थीगण, आचार्य गण, श्रद्धालुगण सहित सैकड़ो श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस गांव के लोगों ने आज आचार्य पण्डित आनंद उपाध्याय जी के आचार्यत्व में पादुका पूजन किया।

