सलधा/बेमेतरा/ छत्तीसगढ़ – जिला के ग्राम सलधा जहां सवा लाख शिवलिंग का ऐतिहासिक मंदिर बन रहा है वहीं उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य अनंत श्री विभूषित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज का दिव्य भव्य चातुर्मास चल रहा है। सर्व प्रथम समस्त ग्रामवासी मोतेसरा और कीर्तन मंडली के द्वारा पादुका पूजन किया गया। दण्डी स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी महाराज ने सलधा शिवलिंग स्थापित करने वाले भक्तों के नाम की घोषणा की। अप्रमेय स्वामी जी ने विरुदावली का वाचन किया। परम पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि अद्वैत और द्वैत दोनों दर्शन है अहं ब्रह्मास्मि कहने वाले हैं और मैं और मेरे भगवान मैं सेवक और भगवान स्वामी हैं। भक्ति के लिए द्वैत अद्वैत से भी सुंदर कहा गया है। एक बार भगवान श्री कृष्ण जी माखन चोरी करने गए तो मणि खंभे में अपनी परछाई देखकर बोले तुम बहुत सुंदर हो बाहर से आए हो चलो दोनों मिलकर चोरी करते हैं। माता आ गई पूंछती है किससे बात कर रहे हो तब भगवान बोले कि ये बहुत सुंदर है इससे मेरी मित्रता करा दो तब माता यशोदा बोली कि तेरे भाग ऐसे नहीं हैं कि तू अपना दर्शन कर सके उसके लिए यशोदा बनना पड़ता है। हम अपने आप को कभी नहीं देख सकते दर्पण में प्रतिबिम्ब को देख कर ऐसा मान लेते हैं कि अपने आप को देख लिया। कभी कभी ज्ञानी भी अपना आत्मा ब्रह्म का दर्शन करने भक्त बन जाते हैं। उसी प्रकार अपने इष्ट भगवान श्री राम की सेवा करने के लिए हनुमान बने। समुद्र मंथन में जब अमृत निकला तो दैत्यों ने अमृत कलश छींन लिया उसी समय देवताओं को अमृत पिलाने भगवान् का मोहिनी अवतार हुआ दैत्य मोहित हो गए मोहिनी को अमृत कलश दिया और बांटने कहा तब दोनों बैठ गये। यह भी मनोविज्ञान है कि सुंदरता पर सब सहज विश्वास कर लेते हैं। देवताओं को अमृत पिलाया गया। मोहिनी अवतार का दर्शन करने सती और शिव भगवान श्री विष्णु जी के पास गये भगवान विष्णु जी ने कहा इसे क्या देखना तब माता सती ने भगवान श्री विष्णु जी से कहा कि मोहिनी रूप दिखा दीजिए। भगवान् ने मोहिनी रूप दिखाया तो शिव जी का तेज स्खलित हो गया उसे अंजना के कान में डाल दिया गया। पुंजिकस्थला अप्सरा थी शाप के कारण बानरी बन गई थी। वहीं अंजना बनी थीं। उसी से हनुमान जी प्रगट हुए। जब दशरथ जी पुत्रेष्टि यज्ञ किये जिससे खीर मिला उसे बांटा गया तो कैकेई के खीर से एक अंश चील लेकर भागा जो अंजना के हाथ में गिरा जिसे अंजना जी ने खा लिया और हनुमान जी हुए। इसलिए भगवान ने कहा तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई। लक्ष्मण सम शत्रुघ्न सम नहीं कहा। भरत सम इसलिए कहा कि हनुमान जी में भरत का अंश है। हनुमान जी बचपन में ही सूर्य को निगल गये। चारों तरफ अंधेरा हो गया इन्द्र ने बज्र से प्रहार किया तो ठुड्ढी हनु में चोट लगी तो हनुमान नाम पड़ गया। और सभी देवताओं ने वरदान दिया। भगवान् श्री सूर्य से विद्या प्राप्त की। बल अधिक होने के कारण चंचलता होने के कारण ऋषियों ने शाप दिया कि अपना बल भूल जाओ। जब हनुमान जी महाराज माता सीता जी के खोज में निकले उस समय जाम्बवान जी ने याद दिलाया तब उनको अपना बल याद आया। उछल कर समुद्र लांघ रहे थे सुरसा आयी और मुंह खोला तो लघु रूप लेकर अंदर जा कर बाहर आ गए। मैनाक ने विश्राम करने कहा हनुमान जी ने कहा कि राम काज किये बिना मैं विश्राम नहीं करुंगा। लंकिनी को घूंसा मारा लंकिनी ने कहा कि स्वर्ग और अपवर्ग से बड़ा सुख लव सत्संग में है।
वही शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी अशोक साहू ने बताया गुजरात से आए किशोरी दवे ने अपने भाव प्रगट किए। छत्तीसगढ़ के पूर्व केबिनेट मंत्री रविन्द्र चौबे ने शंकराचार्य से आशीर्वाद लिया और कहा कि शंकराचार्यजी शिव जी के ही स्वरुप हैं। उनके मुख से कथा सुनना परम सौभाग्य है। उत्तराखंड कांग्रेस के महासचिव राकेश नेगी जी भी आकर आशीर्वाद लिये।
इस अवसर पर दंडी स्वामी उमेश आश्रम जी महाराज, सुरेंद्र आश्रम जी महाराज, वासुदेवाश्रम जी महाराज, छोटे आश्रम जी महाराज, शिवाश्रम जी महाराज, रामाश्रम जी महाराज, श्रीमज्ज्योतिर्मायनंद: सरस्वती जी महाराज, स्वामी श्री अप्रयय शिवसदातकृतानंद गिरी जी महाराज, ब्रह्मचारी शारदानंद, शंकर स्वरूप, प्रभु प्रभुतानंद, शंभु प्रेमानंद, ईश्वरानन्द, वैष्णवानंद, साधु सर्व शरण, आदि अनंतानन्द, बाबा धार्त धार्यानंद, मुक्तानंद, साध्वी पूर्णांबा, साध्वी शारदाम्बा, आनंद उपधाध्य, रत्ना देवी उपाध्याय, रवि शास्त्री, प्रवीण गर्ग, अनुराग शर्मा, सनोज, संतोष मंडल, गौतम जैन, बलराम साहू, अश्वनी साहू, वेद पाठी विद्यार्थीगण, पुरुषोत्तम पटेल, घनश्याम आदिवासी, महेंद्र चौहान, राजेश वैष्णव सहित श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कलाकारों ने भजन और नृत्य प्रस्तुत किया।
परम पूज्य शंकराचार्य जी प्रतिदिन 5 बार पूजन करते हैं सुबह 4.30 , 6.45, 9.45, 4.45 और शाम को 6.45 बजे। सुबह 8 से 9.30 वेदांत पाठ होता है दोपहर को 2.30 से सत्संग प्रवचन होता है।
बहुत अधिक संख्या में भक्तों के द्वारा प्रवचन का लाभ लिया गया। सभी श्रद्धालुओं ने मिलकर आरती की।

