सलधा – बेमेतरा जिला के ग्राम सलधा जहां सवा लाख शिवलिंग का ऐतिहासिक मंदिर बन रहा है वहीं उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य अनंत श्री विभूषित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज का दिव्य भव्य चातुर्मास चल रहा है। सर्व प्रथम समस्त ग्रामवासी भुसुण्डी के द्वारा पादुका पूजन किया गया।
दण्डी स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी महाराज ने सलधा शिवलिंग स्थापित करने वाले भक्तों के नाम की घोषणा की। आनंद जी ने विरुदावली का वाचन किया। परम पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि ये समाज सब को सम्मान नहीं देता किसी किसी को देता है किसको देता है जिसके पास पांच व हो विद्या हो, वाणी सुंदर हो, वपु सुंदर हो, वस्त्र सुंदर हो और वैभव हो उनका सम्मान होता है। इसमें भी शिव का व है। द्रोणाचार्य जी ऋषि भारद्वाज की संतान हैं जिसे भारद्वाज जी ने बिना मां के दोने से उत्पन्न हुए। दोने को द्रोण कहते हैं इसलिए नाम द्रोणाचार्य हुआ भारद्वाज के शिष्य भी हैं भारद्वाज जी कुलपति थे जो 10 हजार शिष्यों को अपने पास रखकर नि: शुल्क पढ़ायें बच्चे और उनके माता-पिता से 1 एक रुपया नहीं लेते उन्हें कुलपति कहते हैं। भारत में शिक्षा नि: शुल्क थी राजा और गरीब का बच्चा एक साथ पढ़ता था। पांचाल का राजकुमार द्रुपद भी वही पढ़ता था दोनों का भोजन वस्त्र व्यवस्था सब एक था दोनों में मित्र बन गये। द्रोणाचार्य जी ने भविष्य की चिंता की तब द्रुपद ने कहा कि जब मैं राजा बनुंगा तब हमारे राज्य को आधा-आधा बांट लेंगे चिंता मत करो कृपाचार्य की बहन कृपी से द्रोणाचार्य जी का विवाह हुआ। एक संन्यासी का जीवन आत्मसाक्षात्कार से सफल होता है और गृहस्थी का जीवन उत्तम पुत्र प्राप्त कर के तब दोनों पति-पत्नी ने शिव जी की तपस्या की और शिव जी के अंश से महान बलवान तेजवान पुत्र हो, जब पुत्र हुआ तब घोड़े के हिनहिनाने की आवाज आई अश्व के जैसे जिसकी थाम (हिनहिनानाहट) हो तो इनका नाम अश्वत्थामा हो गया। गरीब के कारण दूध नहीं था तो आटा घोलकर पिलाते थे एक दिन गांव में भगवती का भोग दूध में मिला स्वाद अलग था बच्चों ने कहा तुम आटे का घोल पीते हो। द्रोणाचार्य जी बहुत दुःखी हुए और अपने मित्र राजा द्रुपद के पास गये राजा मिले नहीं तो द्रोणाचार्य जी आम जनता के साथ जा कर मिले राजा द्रुपद ने अपमान किया तब द्रोणाचार्य घर नहीं गये कौरव पांडव बच्चे थे खेल रहे थे उसी समय उनकी गेंद कुंए में गिरी जिसे द्रोणाचार्य जी ने निकाल दिया तब पितामह भीष्म जी ने द्रौणाचार्य जी को कौरवों और पांडवों के शिक्षा देने के लिए नियुक्त कर दिया। सभी ने शिक्षा ग्रहण की अर्जुन सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बने द्रोणाचार्य जी ने कहा द्रुपद को बन्दी बनाकर लाओ तब अर्जुन द्रुपद को बन्दी बना लाये द्रोणाचार्य जी ने राज्य के दो टुकड़े कर दिए एक द्रुपद को दिया एक अपने पास रखा द्रोणाचार्य ने मित्रता निभाई। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भगवान शिव जी के अवतार हैं। अधार्मिक पापी राजाओं के संहार की भूमिका बन रही थी इसलिए संहार के देवता शिव जी को आना ही था अश्वत्थामा अमर हैं जब कल्कि अवतार होगा तो पापियों को मारने उनके अंत करने में भगवान कल्कि के प्रथम सहायक अश्वत्थामा होंगे। जब अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पांच पुत्रों को मारा उत्तरा के गर्भ में बाण चलाया तब भगवान श्रीकृष्ण जी ने रक्षा की अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ कर ले आये तब द्रौपदी ने कहा कि इसे छोड़ दो ये गुरु पुत्र हैं तब भगवान से पूंछा तो भगवान ने कहा कि आततायियों को मार देना चाहिए और ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड नहीं दिया जा सकता। सम्माननीय पुरुषों का अपमान वध के समान होता है इसलिए अर्जुन ने अश्वत्थामा की मणि निकाल कर अपमानित कर भगा दिया। आज भी अश्वत्थामा अपने घाव के साथ घूंमते हैं। भगवान् श्री शिव जी ने अवतार लेकर दिखाया कि वे भी कर्म की डोर से बंधे हैं। इसलिए किसी को भी पाप, अपराध और ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिसका फल दु:आ हो। धर्म का पालन करते हुए सदाचार संपन्न जीवन जीना चाहिए।
साध्वी जगदंबा डा निशिता जी
गुजरात के विपिन दवे ने कहा कि अपने भाव प्रकट किये।
कलाकारों ने भजन और नृत्य प्रस्तुत किया।
परम पूज्य शंकराचार्य जी प्रतिदिन 5 बार पूजन करते हैं सुबह 4.30 , 6.45, 9.45, 4.45 और शाम को 6.45 बजे। सुबह 8 से 9.30 वेदांत पाठ होता है दोपहर को 2.30 से सत्संग प्रवचन होता है।
बहुत अधिक संख्या में भक्तों के द्वारा प्रवचन का लाभ लिया गया। सभी श्रद्धालुओं ने मिलकर आरती की।
